मोहम्मद रफी साहब के गाए गीत दिल को सुकून दे जाते हैं 

(24 दिसंबर, महान पार्श्व गायक मोहम्मद रफी की 101 वीं जयंती पर विशेष)

Dec 24, 2025 - 22:08
 0  17
मोहम्मद रफी साहब के गाए गीत दिल को सुकून दे जाते हैं 

भारत के महान पार्श्व गायक मोहम्मद रफी साहब की गायकी को सदा दुनिया याद रखेगी। उन्होंने भारतीय हिन्दी सिनेमा को एक से एक महत्वपूर्ण गीतों से नवाजा। उनके गाए गीत आज भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत ही पसंद किए जाते हैं। उनके गाए गीत दिल को सुकून दे जाते हैं । साथ ही उनकी गायिकी जीवन के झंझावातों से संघर्ष करने की ताकत देती है। वे  जितने बड़े गायक थे,  वास्तविक जीवन में उतने ही सहज और सरल थे। मोहम्मद रफ़ी साहब  का जन्म 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह में  हुआ था । उनकी प्रारंभिक स्कूलिंग कोटला सिंह में ही हुई थी। वे  इस धरा पर लगभग 56 वर्षों तक रहे थे।  वे 31 जुलाई 1980 को इस दुनिया से सदा सदा के लिए विदा  हो गए थे। वे हिन्दी सिनेमा के श्रेष्ठतम पार्श्व गायकों में से एक थे। वे  अपनी आवाज की मधुरता लिए समकालीन गायकों के बीच एक  अलग पहचान बनाई थी। मोहम्मद रफी साहब को  शहंशाह-ए-तरन्नुम भी कहा जाता रहा है। आज भी उनकी यह उपाधि उसी रूप में बरकरार है। यह रफी साहब के लिए एक बड़ी उपलब्धि के सवाल है।
 मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ ने अपने आगामी दिनों में कई नए गायकों को प्रेरित किया। इनमें सोनू निगम, मुहम्मद अज़ीज़ तथा उदित नारायण का नाम उल्लेखनीय है ।  मोहम्मद रफी साहब ने  1940 के दशक से आरंभ कर 1980 तक कुल पांच हजार गाने गाए थे।  उन्होंने इन हिन्दी गानों के अलावा ग़ज़ल, भजन, देशभक्ति गीत, क़व्वाली तथा अन्य भाषाओं  के   गीतों को स्वर दिया था। 
मोहम्मद रफी साहब के गाए  गीतों पर  गुरु दत्त, दिलीप कुमार, देव आनंद, भारत भूषण, जॉनी वॉकर, जॉय मुखर्जी, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, जीतेन्द्र तथा ऋषि कपूर मिथुन चक्रवर्ती गोविंदा, किशोर कुमार आदि कलाकारों ने यादगार अभिनय किया। आज भी  इन अभिनेताओं के गीत इसलिए सुने जाते हैं कि इन गीतों को स्वर मोहम्मद रफी साहब ने दिया था। 
  मोहम्मद रफी साहब करीब जब सात साल के थे,  तब उनका परिवार रोजगार के सिलसिले में लाहौर आ गया। इनके परिवार का संगीत से कोई खास सरोकार नहीं था। जब रफ़ी साहब छोटे थे,  तब इनके बड़े भाई की नाई की दुकान थी। रफ़ी साहब का काफी वक्त वहीं पर गुजरता था।  ऐसा कहा जाता है कि रफ़ी साहब जब सात साल के थे, तो वे अपने बड़े भाई की दुकान से होकर गुजरने वाले एक फकीर का पीछा किया करते थे,  जो उधर से गाते हुए जाया करता था। उसकी आवाज रफ़ी साहब को पसन्द थी। वे उस फकीर की नकल किया करते थे। उनकी नकल में अव्वलता को देखकर लोगों को उनकी आवाज भी पसन्द आने लगी। लोग नाई की दुकान में उनके गाने की प्रशंशा करने लगे। लेकिन इससे रफ़ी को स्थानीय ख्याति के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला। इनके बड़े भाई मोहम्मद हमीद ने इनके संगीत के प्रति इनकी रुचि को देखा और उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास संगीत शिक्षा के लिए में दिया। मोहम्मद रफी साहब को यहां संगीत की बहुत ही ऊंची और अच्छी तालीम मिली। उनकी गायिकी में और भी निखार आ गया था।
 एक बार  ऑल इंडिया रेडियो, लाहौर में उस जमाने के प्रख्यात गायक-अभिनेता कुन्दन लाल सहगल अपना प्रदर्शन करने आए थे। उनको  सुनने हेतु मोहम्मद रफ़ी और उनके बड़े भाई भी गए थे। बिजली गुल हो जाने की वजह से सहगल ने गाने से मना कर दिया था। रफ़ी के बड़े भाई ने आयोजकों से निवेदन किया कि भीड़ की व्यग्रता को शांत करने के लिए मोहम्मद रफ़ी को गाने का मौका दिया जाय। उनको अनुमति मिल गई । मात्र 13 वर्ष की आयु में मोहम्मद रफ़ी साहब ने यह पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। प्रेक्षकों में श्याम सुन्दर, जो उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे, ने भी उनको सुना और काफी प्रभावित हुए। उन्होने मोहम्मद रफ़ी को अपने लिए गाने का न्यौता दिया था। आयोजित इस कार्यक्रम में जितने भी गायक संगीतकार सम्मिलित हुए थे, सभी ने रफीक साहब की गायकी  सुनकर यह अंदाजा लगा लिया था कि आने वाले दिनों में यह एक बड़े गायक के रूप में सामने आएगा। यह बात सच साबित हुई। मोहम्मद रफ़ी साहब ने  प्रथम गीत एक पंजाबी फ़िल्म गुल बलोच के लिए गाया था ।  1946 में मोहम्मद रफ़ी साहब ने मुम्बई आने का फैसला लिया था। 
संगीतकार नौशाद ने मोहम्मद रफी साहब को 'पहले आप' नाम की फ़िल्म में गाने का मौका दिया था। नौशाद द्वारा सुरबद्ध गीत तेरा खिलौना टूटा, फ़िल्म अनमोल घड़ी, 1946 से रफ़ी साहब को प्रथम बार हिन्दी जगत में ख्याति मिली थी । इसके बाद शहीद, मेला तथा दुलारी में भी रफ़ी साहब ने गाने गाए जो बहुत प्रसिद्ध हुए। 1951 में जब नौशाद फ़िल्म बैजू बावरा के लिए गाने बना रहे थे,  तो उन्होने अपने पसंदीदा गायक तलत महमूद से गवाने की सोची थी। कहा जाता है कि उन्होने एक बार तलत महमूद को धूम्रपान करते देखकर अपना मन बदल लिया और रफ़ी से गाने को कहा था । बैजू बावरा के गानों ने रफ़ी को मुख्यधारा गायक के रूप में स्थापित किया। इसके बाद नौशाद ने रफ़ी को अपने निर्देशन में कई गीत गाने को दिए। लगभग इसी समय संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन को उनकी आवाज पसंद आयी और उन्होंने भी रफ़ी से गाने गवाना आरंभ किया।
  शंकर जयकिशन उस समय राज कपूर के पसंदीदा संगीतकार थे, पर राज कपूर अपने लिए सिर्फ मुकेश की आवाज पसन्द करते थे। बाद में जब शंकर जयकिशन के गानों की मांग बढ़ी तो उन्होंने लगभग हर जगह रफ़ी साहब का प्रयोग किया। यहाँ तक की कई बार राज कपूर के लिए रफी साहब ने गाया। जल्द ही संगीतकार सचिन देव बर्मन तथा उल्लेखनीय रूप से ओ पी नैय्यर को रफ़ी की आवाज़ बहुत रास आयी और उन्होने रफ़ी से गवाना आरंभ किया। ओ पी नैय्यर का नाम इसमें स्मरणीय रहेगा क्योंकि उन्होने अपने निराले अंदाज में रफ़ी-आशा की जोड़ी का काफी प्रयोग किया और उनकी खनकती धुनें आज भी उस जमाने के अन्य संगीतकारों से अलग प्रतीत होती हैं। उनके निर्देशन में गाए गानो से रफ़ी को बहुत ख्याति मिली और फिर रवि, मदन मोहन, गुलाम हैदर, जयदेव, सलिल चौधरी इत्यादि संगीतकारों की पहली पसंद रफ़ी साहब बन गए थे 
   1950 के दशक में शंकर जयकिशन, नौशाद तथा सचिनदेव बर्मन ने रफ़ी साहब से उस समय के बहुत लोकप्रिय गीत गवाए थे। यह सिलसिला 1960 के दशक में भी चलता रहा था । संगीतकार रवि ने मोहम्मद रफ़ी का इस्तेमाल 1960 के दशक में किया था। 1960 में फ़िल्म चौदहवीं का चांद के शीर्षक गीत के लिए रफ़ी को अपना पहला फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद घराना1961, काजल, 1965, दो बदन, 1966 तथा नीलकमल , 1968 जैसी फिल्मो में इन दोनो की जोड़ी ने कई यादगार गीतों में स्वर दिया था। 1961 में रफ़ी को अपना दूसरा फ़िल्मफेयर आवार्ड फ़िल्म ससुराल के गीत तेरी प्यारी प्यारी सूरत को के लिए मिला। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपना आगाज़ ही रफ़ी के स्वर से किया और 1963 में फ़िल्म पारसमणि के लिए बहुत सुन्दर गीत बनाए। इनमें सलामत रहो तथा वो जब याद आये, लता मंगेशकर के साथ, उल्लेखनीय है। 1965 में ही लक्ष्मी-प्यारे के संगीत निर्देशन में फ़िल्म दोस्ती के लिए गाए गीत चाहूंगा मै तुझे सांझ सवेरे के लिए रफ़ी को तीसरा फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। 1965 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा। मोहम्मद रफी साहब आज सशरीर हमारे बीच न होकर भी उनकी मौजूदगी का एहसास हर पल होता रहता है।  उनके गए गीत सदा सूरज और चांद की तरह चमकते रहेंगे।  वे  जितने अच्छे गायक थे, उतने ही अच्छे उनका किरदार था।  उनका व्यक्तित्व कृतित्व साधारण होकर भी बेमिसाल था।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0