एक विधवा की दर्द भरी दास्तां बयां करती रतन वर्मा की कहानी 'रैना' - पार्ट 1

राममोहन राय के जमाने में पति की मृत्यु के बाद स्त्री को पति के साथ जला कर  सती कर देने जैसी कुप्रथा हुआ करती थी । तब राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई थी।

Aug 25, 2025 - 16:02
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एक विधवा की दर्द भरी दास्तां बयां करती रतन वर्मा की कहानी 'रैना' - पार्ट 1

देश के जाने-माने कथाकार रतन वर्मा की 'रैना' कहानी एक विधवा हो गयी संघर्षरत युवती रैना की दर्द भरी दास्तां पर आधारित है । आज हमारे देश ने आधुनिकता के आकाश जितनी ऊंचाई को क्यों न छू लिया हो, लेकिन एक विधवा स्त्री या फिर एक सामान्य स्त्री के प्रति  समाज की दृष्टि नहीं बदली है। आज भी हम सबों का वही पुराना रूढ़िवादी नजरिया बरकरार  है । यह कहानी समाज के इस रूढ़िवादी सोच पर भी सवाल खड़े करती है। ध्यातव्य है कि राजा राममोहन राय के जमाने में पति की मृत्यु के बाद स्त्री को पति के साथ जला कर  सती कर देने जैसी कुप्रथा हुआ करती थी । तब राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई थी। इस आंदोलन को  आम जन का ज़बरदस्त समर्थन मिला था। तत्कालीन सरकार ने भी सती प्रथा के विरुद्ध कानून बनाया। तब कहीं जाकर सती प्रथा रुकी । सती प्रथा तो रुक गयी , लेकिन आज भी समाज की विधवा स्त्रियों के हालात ऐसे हैं कि अब उनके तन को तो सती नहीं किया जाता, मगर आत्मा को ऐसे दहकाया जाता है कि विधवाएं महसूस करती हैं कि इससे अच्छा तो सती प्रथा ही थी कि एक बार में ही विधवाओं को जला कर भष्म कर दिया जाता था। एक प्रकार से आज के आधुनिकतम समाज में भी विधवाओं के साथ अछूत  जैसा व्यवहार किया जाता है। किसी भी मांगलिक प्रयोजन से उन्हें दूर रखकर उन्हें हर क्षण एहसास दिलाया जाता है कि वह विधवा हैं, यानी अछूत जैसी।  जबकि इस समय उसे सहारे की बेहद जरूरत होती है। अन्ततः वह  एक अकेलापन की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाती हैं ।
        बहरहाल ,रतन वर्मा की यह 'रैना' कहानी है तो एक विधवा स्त्री की पीड़ा की ही कहानी, लेकिन इसका कथानक थोड़ा हटकर और दिलचस्प है।  उन्होंने इस कहानी  के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि पति के मर जाने के बाद एक विधवा स्त्री की क्या दुर्दशा हो सकती  है ।
  'रैना' एक  निम्न वर्गीय परिवार की एक सुंदर लड़की होती है। जैसे सबके अपने-अपने अरमान होते हैं,उसी तरह रैना के भी अरमान थे। समय के साथ अर्थाभाव में रैना की माँ अपनी बेटी की शादी एक गरीब और रुग्ण से दिखने वाले  युवक से करवा देती है, जो शहर में रहकर छोटी - मोटी मजदूरी करके अपना और अपनी पत्नी का भरण-पोषण करता है। रैना, अपने पति के साथ बहुत खुश है । साल बीतते, न बीतते उसे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। रैना की गृहस्थी अपने पति के साथ ठीक-ठाक गुजर रही होती है। तभी एक दिन उसके पति का अचानक निधन हो जाता है।  रैना की हंसती खेलती जिंदगी में एक बड़ा तूफान आ जाता है। सहारे के तौर पर रैना के पास कोई नहीं है। उसकी माँ गाँव में रहकर चौका-बरतन करके अपना जीवन यापन करती है। वह चाहती है कि रैना गांव में उसके पास ही आकर रहे, लेकिन चूंकि रैना ने अपने बेटे का नाम एक स्कूल में दर्ज करवा रखा है, इसलिये वह माँ के पास जाने से मना कर देती है और ख़ुद अपनी झोंपड़ी से थोड़ी दूरी पर बने अपार्टमेंट के चार फ्लैट्स में झाड़ू-बरतन का काम करने  लगती है।वह अपने काम से कम से कम छुट्टी लेती है, इससे उसकी मालकिनें उससे बहुत खुश रहती हैं। अक्सर काम करते हुए पति की याद में उसके आंसू भी निकल आते हैं, लेकिन वह अपने आंसुओं को पोंछते हुए अपने काम  में लग जाया करती है। 
    उसी दौरान रैना के जीवन में एक ऐसा तूफान आता है कि जो उसकी जिंदगी को एक भीषण झंझावात में ढकेल देता है। फ्लैटों में काम करते हुए ही अकस्मात वह गर्भवती हो जाती है।  
   जिन चार घरों में रैना काम करती है, उन घरों की महिलाओं को जब उसके गर्भवती होने का पता चलता है, तब सभी पहले तो उससे उसके पेट के बच्चे के बाप का नाम जानना चाहती हैं और जब रैना सभी से कहती है कि वह सिर्फ उसका बच्चा है, तब सभी महिलाओं को अपने पतियों पर शक़ होने लगता है कि रैना ने कहीं उनके पतियों में से ही किसी को तो नहीं पटा रखा है।    अन्ततः वे चारों मालकिनें  रैना को अपमानित करके नौकरी से ही हटा देती हैं। अब रैना के सामने एक बड़ी समस्या उपस्थित हो आती है---- अपने और अपने बच्चों के जीवन यापन की। काम तो उसे अब  कहीं मिलने से रहा।इसलिये कि पूरे इलाके में उसकी बदनामी बुरी तरह फैल चुकी होती है। फिर भी वह जीतोड़ कोशिश करती है कि कहीं भी उसे काम मिल जाय। पर हर जगह से उसे ज़िल्लत के अलावा कुछ नहीं मिलती।  
    इतनी दुश्वारियों को झेलते हुए भी  रैना अपने बच्चे को जन्म देती है। रैना अब दो -दो बच्चों की मां हो चुकी है । चूंकि रैना पूरे इलाके में एक बदचलन विधवा के रूप में ख्यात हो चुकी है और बेरोजगार भी, इसलिये अपने बच्चों के लालन-पालन के लिये लोगों के आगे हाथ फैलाने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं बचता।
 कथाकार ने रैना  के माध्यम से समाज के समक्ष यह सवाल खड़ा किया है कि उसे पेट से करने वाले के खिलाफ किसी ने अंगुली नहीं उठाई बल्कि हर ओर से उंगली सिर्फ और  सिर्फ रैना के खिलाफ ही उठी। चूंकि  वह एक विधवा थी। अगर वह विधवा नहीं होती और किसी और के साथ हमबिस्तर होकर पेट से हो गयी होती , तब उसके पेट के बच्चे को उसके पति का ही बच्चा मानकर  कोई भी उसपर उंगली नहीं उठाता।
  समय के साथ रैना की जिंदगी बड़े ही कष्ट के साथ गुजर रही थी। उसके पास खाने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचा था। उसके नवजात शिशु के लिए भी उसके स्तन में दूध  शेष नहीं था।  गरीबी और बेरोजगारी ने रैना के शरीर को  जर्जर बना दिया था । 
       जब बच्चा जोर जोर से भूख से चिल्लाने लगता है, तब वह दूसरे मुहल्ले के एक घर का दरवाजा खटखटाती है। उस घर की हालत यह है कि घर का नौकर नौकरी छोड़ कर चला गया है। घर के काम को लेकर माँ-बेटी में चिक-चिक मची हुई है। यानी घर का काम ज्यों का त्यों पड़ा हुआ है।
      दरवाजे पर दस्तक सुनकर घर की मालकिन दरवाजा खोलती है। लेकिन रैना पर नज़र पड़ते ही वह उसे दुत्कारने लगती है। तभी मालकिन की बेटी मां को अंदर ले जाकर बोलती है कि घर में इतना काम पड़ा है, आज काम करवा लीजिये। उसके बच्चे को दूध दे दीजिये और पाँच रुपये भी। आज का काम निपट जाय, फिर कल का कल देखेंगे।
      
विजय केसरी,
(कथाकार/स्तंभकार)
पंच मंदिर चौक,
हजारीबाग -825301.
मोबाइल नंबर : 9234799550.

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समीक्षा 

एक विधवा की दर्द भरी दास्तां बयां करती रतन वर्मा की 'रैना' कहानी 
(भाग दो)

विजय केसरी 

 बेटी की बात मालकिन की समझ में आ जाती है। वह रैना को कई सारी हिदायतें देकर कहती हैं कि घर में कुछ काम पड़ा है , उसे निपटा दे, बदले में उसे बच्चे के लिये दूध, उसे खाना और पाँच रुपये भी देंगी। रैना पूरे उत्साह से भरकर घर का काम पूरे मनोयोग से करती है , जिससे मालकिन प्रसन्न होकर उसे काम पर रख लेती हैं।
  कुछ महीनों के बाद रैना को पता चलता है कि गाँव में उसकी मां की तबीयत खराब है। रैना मालकिन से दो - चार दिनों की छुट्टी मांगती है कि वह गाँव से माँ को देखकर दो दिनों में लौट आएगी। लेकिन मालकिन यह कहते हुए कि फिर घर का काम कौन करेगा, छुट्टी देने से मना कर देती हैं। तभी उनकी बेटी माँ को कमरे में ले जाकर कहती है कि इस रैना पर नज़र रखने के क्रम में कि हमारी अनुपस्थिति में कहीं वह पापा पर न डोरे डाल दे , इसलिये मामा के पास हम पटना भी नहीं जा सके हैं। तो क्यों न आप उसे छुट्टी दे ही देती हैं । मालकिन रैना पर एहसान सा जताते हुए उसे पूरे एक सप्ताह की छुट्टी दे देती हैं और ख़ुद अपनी बेटी के साथ उसी रात पटना के लिये रवाना हो जाती हैं। मालकिन के पति को ढेर सारे काम निपटाने होते हैं, इसलिये वे साथ नहीं जाते ।
    दो दिन ही बीते हैं कि घर के मालिक बहुत जोरों से बीमार पड़  जाते हैं।  वह दवा लाने की स्थिति में भी नहीं होते।‌
    रैना गाँव पहुँच कर देखती है कि उसकी माँ अब स्वस्थ है। इसलिये, यह सोचकर कि मालकिन को घर का काम करने में दिक़्क़त हो रही होगी, वह दो दिन ही माँ के पास रहकर लौट आती है। दूसरे दिन सुबह जब रैना मालकिन के यहाँ काम करने के लिये पहुँचती है, तो पाती है कि मालकिन और उनकी बेटी कहीं बाहर गयी हुई हैं और मालिक घर में बुरी तरह बीमार हैं। मालिक को बीमार देख रैना द्रवित हो जाती है और उनकी सेवा-सुश्रुखा में जुट जाती है।  वह बाजार जाकर मालिक के लिए दवा भी ला देती है।  अच्छी  सेवा से मालिक तीसरे ही दिन स्वस्थ हो जाते हैं।मालिक को भी रैना के चरित्र का पता है , इसलिये वे रैना को धंधे वाली जैसी समझते हुए , जब रैना शाम को घर लौटने के लिये मालिक से इज़ाज़त लेने जाती है, तो मालिक उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी ओर खींचने लगते हैं।
      रैना घूर कर मालिक की ओर देखती हुई एक झटके से अपना हाथ छुड़ाकर बाहर निकल जाती है। 
  घर की मालकिन और बेटी के आने के बाद रैना काम के लिए घर के दरवाजे पर दस्तक देती है।  रैना को देखकर घर की मालकिन आग बबूला हो जाती है। वह कहती हैं कि तुम मेरी अनुपस्थिति में क्यों घर आ गई थी ? रैना ने कहा कि मालिक की तबीयत बहुत जोरों से खराब थी। यह देखकर मैं कैसे नजरअंदाज कर सकती थी। अगर मालिक को  कुछ हो जाता तो ? 
   यह सुनकर घर की मालकिन चिल्लाती हुई रैना से कहती हैं ,"  तबीयत मेरे पति की खराब थी, इससे तुझे क्या ? वे मरें या जियें,  आकर मैं समझती . . । " 
   यह सुनकर रैना मालकिन जैसे तेवर में कह उठती है, " बस मालकिन, बस  !  विधवा दर्द क्या होता है, इसे आप क्या समझेंगी ? आपके मांग में तो चम-चम सिन्दूर चमक रहा है न। अगर मेरी मांग में भी आपकी तरह सिन्दूर होता और तब मैं किसी दूसरे के साथ चुपके से पेट में बच्चा भर लेती, तब तो मुझे कोई कुछ नहीं कहता ? यही होती है सिन्दूर की महिमा । मैं एक विधवा के रूप में कैसी जिंदगी जी रही हूं,इसे मैं ही जानती हूं। अगर मैं मालिक को उसी हाल में छोड़ कर चली जाती और मालिक को कुछ हो जाता, तब आपका क्या होता ? यही सोचकर मैं मलिक की सेवा करती रही।
     मालकिन एक विधवा की सच्चाई को समझ जाती हैं और रैना को काम पर रख लेती हैं।

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