कानू समाज में दिवाली का विशेष महत्व — भूंजा से होती है पूजा अन्न देवता की आराधना और समृद्धि का पर्व
कानू समाज में दिवाली का विशेष महत्व — भूंजा से होती है पूजा, अन्न देवता की आराधना और समृद्धि का पर्व
गयाजी। कानू समाज के लिए दिवाली केवल दीपों और सजावट का पर्व नहीं, बल्कि अन्न की पवित्रता, श्रम की गरिमा और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। यह समाज अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों में अन्न और कृषि को सर्वोच्च स्थान देता है। दिवाली का यह पावन अवसर उनके लिए अन्न देवता की आराधना और आने वाले वर्ष की समृद्धि का शुभ संकेत लेकर आता है।
भूंजा से होती है पूजन-अर्चन की शुरुआत
कानू समाज के प्रवक्ता प्रकाश कुमार गुप्ता ने बताया कि “हमारे पूर्वजों का पेशा भूंजा तैयार करने से जुड़ा रहा है, और यह परंपरा आदि काल से चली आ रही है। दिवाली के दिन भूंजा का विशेष महत्व होता है। समाज के लोग इस दिन पारंपरिक रूप से चना, मकई, गेहूं, चावल आदि अनाजों का भूंजा तैयार करते हैं और उसी से अन्न देवता की पूजा-अर्चना करते हैं।”
मान्यता है कि इस विधि से की गई पूजा से घर में सुख-शांति बनी रहती है और आने वाले वर्ष में फसल की भरपूर उपज होती है। यह पूजा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि अन्न के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को भी प्रकट करती है।
प्रकाश पर्व पर उमंग और एकता का माहौल
दिवाली की रात कानू समाज के घर-घर में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस शुभ अवसर पर समाज के विभिन्न संगठनों की ओर से सामूहिक पूजा, दीपोत्सव समारोह और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं और पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेते हैं। सामूहिक दीप प्रज्वलन और गीत-संगीत के कार्यक्रम पूरे वातावरण को आध्यात्मिकता और उत्साह से भर देते हैं।
अन्न और श्रम के सम्मान की परंपरा
यह विशिष्ट परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के सांस्कृतिक मूल्यों का भी प्रतीक है। भूंजा से की जाने वाली पूजा अन्न के महत्व, श्रम की गरिमा और कृषि संस्कृति के सम्मान को जीवंत रखती है। कानू समाज इस अनूठी परंपरा के माध्यम से पीढ़ियों से यह संदेश देता आ रहा है कि समृद्धि का वास्तविक स्रोत अन्न और श्रम ही है।
इस प्रकार, दिवाली कानू समाज के लिए केवल रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि अन्न, आस्था और आत्मनिर्भरता का पवित्र उत्सव है — जो उनके जीवन और संस्कृति को नई ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करता है।






